| जब भी हो जाओ बेचैन ये मानना |
| खोल कर आँख में सो रहा हूँ कहीं, |
| टूट कर कोई केसे बिखरता यहाँ |
| देख लेना कोई आइना तोड़ कर; |
| मैं तो जब जब नदी के किनारे गया |
| मेरा लहरों ने तन तर बतर कर दिया, |
| पार हो जाऊँगा पूरी उम्मीद थी |
| उठती लहरों ने पर मन में डर भर दिया, |
| रेत पर बेठ कर जो बनाया था घर |
| आ गया हूँ उसे आज फिर तोड़ कर, |
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